हरियाणा का प्रमुख पर्यटक एवं श्रद्धा स्थल ध्यान-कक्ष बना आकर्षण का केन्द्र

 हरियाणा का प्रमुख पर्यटक एवं श्रद्धा स्थल ध्यान-कक्ष बना आकर्षण का केन्द्र





FARIDABAD NEWS, 11 FEB 2022 : सजनों यदि आज किसी भी व्यक्ति, जाति, समाज, देश व विश्व की हालत को गौर से देखे तो ज्ञात होता है कि स्वार्थपरता, अहंकार और मनमत की प्रधानता के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, राजनैतिक व आर्थिक सभी स्तरों पर आज विषमता का तांडव अबाध गति से चल रहा है। ऐसे में भले ही भौतिक ज्ञान-विज्ञान के विकास ने जगत के कई अज्ञात रहस्यों को प्रकट कर दिया है और भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि कर कई ऐसे साधन अविष्कृत कर दिए हैं जिनसे बाह्य इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ने व फैलने का व्यापक क्षेत्र मिला है परन्तु शरीर के भीतर जिस चेतना का, आत्मा का निवास है उसके विकास के प्रति प्रयत्न उस अनुपात में नहीं हो पा रहा है। नतीजा जीवन का संतुलन बिगड़ गया है, नैतिक सिद्धान्तों और आचरण की खाई चौड़ी हो गई है और  संतोष, धैर्य, सच्चाई, धर्म, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों से कटा आत्मविस्मृत इंसान विषय-विकारों की दासता स्वीकार कर, दानवता का पोषक बन बैठा है।
इंसान की इसी दुर्भाग्यपूर्ण, दु:खद व अधम अवस्था को देखकर सतयुग दर्शन ट्रस्ट ने अपने परिसर सतयुग दर्शन वसुन्धरा पर विश्व का प्रथम समभाव-समदृष्टि का स्कूल खोला है जहाँ से मानव को उसकी श्रेष्ठता, विद्वत्ता, गुणवत्ता, बलवत्ता, धनवत्ता, बुद्धिमत्ता व ज्ञानवानता का युक्तिसंगत एहसास करा, पुन: नैतिक व चारित्रिक रूप से सर्वोत्कृष्ट बनाने का सतत्‌ प्रयास किया जा रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि यहाँ न किसी शरीर की पूजा-मानता है न तस्वीर की अपितु यहाँ से तो प्रत्येक इंसान को समभाव समदृष्टि की युक्ति अनुरूप अपने ख़्याल का नाता नित्य शब्द गुरु यानि मूलमंत्र आद्‌ अक्षर- ईश्वरवाचक प्रणव मंत्र के साथ जोड़कर वही से आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने की तालीम दी जाती है ताकि इंसान की बुद्धि प्रकाशित हो और वह अपने असली तत्व यानि आत्मा में जो है परमात्मा उसका बोध कर सके।
इस प्रकार भौतिक विद्या से भिन्न, आत्मिक विद्या प्रदान करने वाले इस स्कूल के माध्यम से प्रत्येक को, बिना किसी भेदभाव के, समभाव समदृष्टि की युक्ति अनुसार ‘शब्द है गुरू शरीर नहीं है‘ का पाठ पढ़ा ‘ईश्वर है अपना आप‘  के विचार पर खड़ा होने का सबक़ सिखाया जा रहा है ताकि हर मानव समभाव नजरों में कर समदर्शिता अनुरूप परस्पर सजन-भाव यानि मैत्री भाव का व्यवहार करने में निपुण हो जाए और एक आदर्श समाज की परिकल्पना साकार हो।
आप सबकी जानकारी हेतु सर्वहित की खातिर, इसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त, निष्कामता से किए जाने वाले सतयुग दर्शन ट्रस्ट के विभिन्न प्रयासों ने विशेष ख़्याति अर्जित कर ली है और सतयुग की पहचान व मानवता के स्वाभिमान के रूप में प्रसिद्ध यह ध्यान-कक्ष यानि समभाव-समदृष्टि का स्कूल अब सबके आकर्षण का मुख्य केन्द्र बन गया है। तभी तो नित्य प्रति यहाँ न केवल सैकड़ों की संख्या में स्कूल/कालेज के बच्चे आते हैं अपितु दिल्ली एन० सी० आर० से विभिन्न सुसाइटियों के सदस्य व आस-पास के ग्रामीण सजन भी ग्रुपों में आते हैं और एकता के प्रतीक इस ध्यान-कक्ष की शोभा देखने के साथ-साथ, यहाँ से प्रसारित हो रही, मानवीय मूल्यों की विचारधारा को सुन-समझ कर दंग रह जाते हैं। यहाँ आप को यह भी बता दें कि समभाव-समदृष्टि का यह स्कूल बिना किसी रंग-भेद, धर्म भेद, जाति-पाति, अमीरी-गरीबी यानि वड-छोट के, नि:शुल्क हर आयु-वर्ग के सदस्यों को मानव-धर्म अपनाकर, मैत्री-भाव अनुसार एकता, एक अवस्था के भाव में बने रहने का संदेश दे रहा है। इस संदेश को मनन कर जीवन में उतारने से ही हम एक दूसरे के दु:ख-सुख को समझकर आत्मभाव व आदर भाव से सब की आत्मा का सत्कार कर सकते हैं और परस्पर सजन-भाव का वर्त-वर्ताव करते हुए एक ऐसे नैतिक समाज का गठन करने में सफल हो जाते हैं जहाँ चारों ओर सुख-शांति व समृद्धि होती है।
ध्यान कक्ष की इस महत्ता को समझते हुए  सजनों हमारे लिए भी बनता है कि निज धर्म अनुरूप विचार-आचार व व्यवहार करने में पारंगत बनने हेतु सपरिवार एक बार अवश्य इस ध्यान कक्ष की शोभा का दर्शन करें। इस विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु आप एक बार अवश्य DhyanKaksh के यू-ट्युब, फेसबुब, इन्सटाग्राम चैनल पर जाए और यहाँ से प्रसारित हो रही गतिविधियों के विषय में जाने। 

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