ध्यान-कक्ष में समय के आवाहन् को समझो और स्वयं में आपेक्षित परिवर्तन ले आओ
ध्यान-कक्ष में समय के आवाहन् को समझो और स्वयं में आपेक्षित परिवर्तन ले आओ
FARIDABAD NEWS, 17 FEB 2022 : ध्यान कक्ष में उपस्थित आज इंजिनियरींग कालेज के बच्चों से कहा गया कि समय के आवाहन् को समझो क्योंकि समय बदलाव की कगार पर खड़ा है यानि कलियुग जा रहा है और सतयुग आ रहा है। सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार ‘सतवस्तु में विचार ते सतज़बान होसी, एक दृष्टि, एकता महान होसी। न जप, न तप, न भजन, न बन्दगी एक अवस्था ओ जगत जहान होसी।‘ अत: वक्त की नजाकत को समझते हुए वक्त से ही स्वयं में आवश्यक स्वाभाविक परिवर्तन ले आओ क्योंकि ऐसा करने पर ही समय की रफ्तार के साथ कदम मिला, प्रसन्नचित्तता से जीवन के उन्नति पथ पर प्रशस्त हो सकोगे।
इस लक्ष्य की सिद्धि हेतु उपस्थित बाल युवाओं से प्रार्थना की कि अपने आधार स्वरूप परमात्मा को जानो और उस संग एकरस अटूट प्रीत जोड़, उसके प्रति विशुद्ध व अपार स्नेह बनाए रखो यानि ऐसे पुरुषार्थी बनो कि सुरत-शब्द के अटूट प्रेम व सम्बन्धों में किसी कारण भी कोई बदलाव न आने पाए। ऐसा करने पर ही आत्म साक्षात्कार कर पाओगे और अपने यथार्थ दिव्य गुणों व शक्ति का बोध कर सम्पूर्णता को प्राप्त हो पाओगे। इस संदर्भ में उन्हे कहा गया कि जानो जहाँ साक्षात्कार द्वारा, देखी हुई बात को स्मृति में रख उसका स्पष्टतया वर्णन करना सहज होता है, वही सुनी हुई बात के परिप्रेक्ष्य में ऐसा करना थोड़ा कठिन होता है। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए सुनने-सुनाने से अधिक आत्म साक्षात्कार को महत्ता दो।
आगे कहा गया कि अगर हकीकत में जितेन्द्रिय बन आनन्द का अनुभव करना चाहते हो तो सत्-चिंतन करो और ध्यान रखो कि आपका ख़्याल व बुद्धि छोटी-छोटी बातों में न उलझे अपितु दृढ़ता की शक्ति से अपने निज शाश्वत स्वरूप को अर्थात् ‘ईश्वर है अपना आप‘ इस सत्य को अपनी स्मृति में प्रबलता से ठहराए रखें। ऐसा करने पर ही अपने वास्तविक ज्ञान और शक्ति को बुद्धि में अटलता से धारण करने में सक्षम बन पाओगे और आपका शारीरिक-मानसिक व आत्मिक बल प्रबल व शक्तिशाली हो पाएगा। ऐसा होने पर आज जो कुछ भी करना असंभव लगता है वह सब कुछ करना संभव लगने लगेगा और हृदयगत संकीर्णताओं से उबर उदारता व विशालता को धारण कर लोगे। फिर हृदय जब विशाल हो गया तो दृष्टि में व्यापकता आएगी और इस तरह दिव्य नेत्रों द्वारा अलौकिक छवि का दर्शन कर नवीनता का अनुभव कर पाओगे। आशय यह है कि फिर दृष्टि शरीर को नहीं अपितु आत्मा-आत्मा को देखेगी और जीने का वास्तविक आनन्द प्राप्त हो जाएगा।
अंत में कहा गया कि खुद पर खुद नजर रखते हुए इसी ओर आगे बढ़ो और अपने सभी गुणों व शक्तियों से भरपूर होकर ऐसा उच्च कोटि का पुरुषार्थ दर्शाओ कि मन-वचन-कर्म द्वारा परमात्मा समान होकर इस जगत में विचरने में सक्षम हो जाओ। इस हेतु याद रखो जब तक जीना है दिल से नहीं हारना। दिल से न हारे तो समझो मन और इन्द्रियों द्वारा अकर्मण्य भाव से कर्म करने में निपुण हो जाओगे और इस तरह समस्त कर्म बंधनों व देह बंधनों से मुक्त हो अपना जीवन सफल बना लोगे। इस तरह अपने असली घर परमधाम पहुँच विश्राम को पा लोगे। अधिक जानकारी के लिए Dhyan-Kaksh के यू-ट्युब, फेसबुब, इन्सटाग्राम चैनल पर जाए या फिर सम्पर्क करें 8595070695
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